हमारे शरीर में दस इंद्रियां, पांच प्राण, मन, बुद्धि, अहंकार= 18 भगवद्गीता में 700 श्लोक हैं। इनमें से 574 श्रीकृष्ण ने, 84 अर्जुन ने, 41 संजय ने और 1 धृतराष्ट्र ने कहा था। कुछ प्रतियों में 701 हैं। ... गीता उपनिषदों और योग शास्त्र का सार है, जिसे भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेश दिया गया था, जो सर्वोच्च आत्मा के अवतार हैं। यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि इस अनंत ब्रह्मांड में श्रीकृष्ण के समान कोई गुरु और अर्जुन जैसा शिष्य नहीं है। उनकी बातचीत व्यास मुनिद्रों द्वारा लिखी गई है और हमारे सामने प्रस्तुत की गई है .. रामायण सर्ग, बाला कांड (77) सर्ग (2256) श्लोक, अयोध्या कांड (119) सर्ग (4415) श्लोक, अरण्य कांड (75) सर्ग (2732) श्लोक, किष्किंधा कांड (67) सर्ग (67) सर्ग (2620) श्लोक, सुंदर कांड (68) सर्ग (3006) श्लोक रामायण ईसा पूर्व का सबसे पुराना है। इतिहासकारों की राय है कि यह किसका है...

Srimad Bhagavad Gita – श्रीमद्भगवद्गीता  
 स्तोत्रम् - Stotras Srimad Bhagavad Gita – श्रीमद्भगवद्गीता Valmiki Ramayanam in Sanskrit – वाल्मीकि रामायणम्

Sri Venkatesha Vijaya Stotram – श्री वेङ्कटेश विजय स्तोत्रम्


दैवतदैवत मङ्गलमङ्गल
पावनपावन कारणकारण ।
वेङ्कटभूधरमौलिविभूषण
माधव भूधव देव जयीभव ॥ १ ॥

वारिदसंनिभदेह दयाकर
शारदनीरजचारुविलोचन ।
देवशिरोमणिपादसरोरुह
वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥ २ ॥

अञ्जनशैलनिवास निरञ्जन
रञ्जितसर्वजनाञ्जनमेचक ।
मामभिषिञ्च कृपामृतशीतल-
-शीकरवर्षिदृशा जगदीश्वर ॥ ३ ॥

वीतसमाधिक सारगुणाकर
केवलसत्त्वतनो पुरुषोत्तम ।
भीमभवार्णवतारणकोविद
वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥ ४ ॥

स्वामिसरोवरतीररमाकृत-
-केलिमहारसलालसमानस ।
सारतपोधनचित्तनिकेतन
वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥ ५ ॥

आयुधभूषणकोटिनिवेशित-
-शङ्खरथाङ्गजितामतसं‍मत ।
स्वेतरदुर्घटसङ्घटनक्षम
वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥ ६ ॥

पङ्कजनानिलयाकृतिसौरभ-
-वासितशैलवनोपवनान्तर ।
मन्द्रमहास्वनमङ्गलनिर्ज्झर
वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥ ७ ॥

नन्दकुमारक गोकुलपालक
गोपवधूवर कृष्ण परात्पर ।
श्रीवसुदेव जन्मभयापह
वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥ ८ ॥

शैशवपातितपातकिपूतन
धेनुककेशिमुखासुरसूदन ।
कालियमर्दन कंसनिरासक
मोहतमोपह कृष्ण जयीभव ॥ ९ ॥

पालितसङ्गर भागवतप्रिय
सारथिताहिततोषपृथासुत ।
पाण्डवदूत पराकृतभूभर
पाहि परावरनाथ परायण ॥ १० ॥

शातमखासुविभञ्जनपाटव
सत्रिशिरःखरदूषणदूषण ।
श्रीरघुनायक राम रमासख
विश्वजनीन हरे विजयीभव ॥ ११ ॥

राक्षससोदरभीतिनिवारक
शारदशीतमयूखमुखाम्बुज ।
रावणदारुणवारणदारण-
-केसरिपुङ्गव देव जयीभव ॥ १२ ॥

काननवानरवीरवनेचर-
-कुञ्जरसिंहमृगादिषु वत्सल ।
श्रीवरसूरिनिरस्तभवादर
वेङ्कटशैलपते विजयीभव ॥ १३ ॥

वादिसाध्वसकृत्सूरिकथितं स्तवनं महत् ।
वृषशैलपतेः श्रेयस्कामो नित्यं पठेत्सुधीः ॥ १४ ॥

इति श्री वेङ्कटेश विजय स्तोत्रम् ।


Sri Venkateshwara Stotras – श्री वेङ्कटेश्वर स्तोत्राणि

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